न्यूज अपडेट्स
दिल्ली, 02 जून। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि अगर कोई वयस्क अपनी मर्जी से सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) का रास्ता चुनता है, तो कानूनन उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत के मुताबिक, स्वेच्छा से यह काम करने वाले किसी भी वयस्क को जबरन बचाने, हिरासत में लेने या सुधार गृह (Correctional Home) भेजने का अधिकार प्रशासन के पास नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से किए जाने वाले इस काम और देह व्यापार के लिए होने वाली मानव तस्करी (Human Trafficking) में बहुत बड़ा अंतर है। कई बार लोगों को धोखे, झांसे या भारी दबाव में इस दलदल में धकेला जाता है, और ऐसे पीड़ितों को पूरी सुरक्षा मिलना बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट (ITPA), 1956 और साल 2022 के अपने एक पिछले फैसले का हवाला देते हुए कानून की सीमाएं भी तय कीं।
अदालत ने दोटूक शब्दों में कहा कि भले ही अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना अपराध के दायरे में नहीं आता, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वेश्यालय या कोठे चलाने की अनुमति दी जा सकती है। कानूनन कमर्शियल तौर पर वेश्यालय चलाना या इस धंधे से मुनाफा कमाना पूरी तरह से गैर-कानूनी और प्रतिबंधित रहेगा।
