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नेशनल डेस्क। एक कर्मचारी ने अपने बॉस के साथ हुई चर्चा का स्क्रीनशॉट साझा किया है। उसने बताया कि बीमारी की छुट्टी लेने पर बॉस ने उसकी लाइव लोकेशन मांगी। यह पोस्ट रेडिट पर वायरल हो गई है और कार्यालय संस्कृति पर बहस छेड़ दी है। कर्मचारी ने बताया कि उसे तेज सिरदर्द के कारण छुट्टी लेनी पड़ी। अगले दिन भी तबीयत न सुधरने पर उसने फिर से अनुरोध किया। इस पर बॉस ने मानव संसाधन विभाग की नीति का हवाला देते हुए उसकी लाइव लोकेशन मांगी।
वायरल पोस्ट में व्हाट्सएप बातचीत के स्क्रीनशॉट शामिल हैं। बॉस ने पहले कर्मचारी से दिन के अंत तक दस्तावेज जमा करने को कहा। फिर उसने तुरंत लाइव लोकेशन साझा करने का अनुरोध किया। कर्मचारी के पूछने पर कि यह जानकारी क्यों जरूरी है, बॉस ने जवाब दिया। उसने कहा कि यह मानव संसाधन विभाग के निर्देशों के अनुसार आवश्यक है। इसके बाद कर्मचारी ने सलाह के लिए रेडिट पर पोस्ट किया।
यूजर्स ने कर्मचारी को लोकेशन साझा न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। एक यूजर ने बीमारी के लिए वैध दस्तावेज की परिभाषा पर ही सवाल उठाया। एक अन्य यूजर ने कहा कि नियोक्ता का कर्मचारी की लोकेशन से कोई संबंध नहीं है। उसने सलाह दी कि सीधे तौर पर इस अनुरोध से इनकार कर देना चाहिए। निजता संबंधी चिंताओं को स्पष्ट रूप से उजागर करना चाहिए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी पुष्टि अपने ऐतिहासिक फैसले में की है। निजी जानकारी साझा करने के लिए कर्मचारी की सहमति अनिवार्य है।
कार्यस्थल पर निगरानी को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। कई कंपनियां उत्पादकता बढ़ाने के लिए ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का उपयोग करती हैं। लेकिन लाइव लोकेशन मांगना एक अलग मुद्दा है जो सीमाओं को पार करता है। किसी भी कंपनी की मानव संसाधन नीति में कर्मचारी अधिकार स्पष्ट होने चाहिए। बीमारी की छुट्टी के लिए दिशा निर्देश पूर्व निर्धारित होने चाहिए। नीति में निजता संबंधी प्रावधानों का उल्लेख अनिवार्य है।
अगर लाइव लोकेशन ट्रैकिंग नीति का हिस्सा है तो उसे रोजगार अनुबंध में शामिल किया जाना चाहिए। कर्मचारियों को नीति से अवगत कराया जाना चाहिए। बिना सूचना के ऐसी मांग करना उचित नहीं माना जा सकता। कार्यस्थल पर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कर्मचारी के स्वास्थ्य का ध्यान रखना नियोक्ता की जिम्मेदारी है। अनावश्यक संदेह और निगरानी से कार्य वातावरण प्रभावित होता है।
विश्वास और सम्मान पर आधारित संबंध ही दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है। सूक्ष्म प्रबंधन की प्रवृत्ति कर्मचारी मनोबल को नुकसान पहुंचाती है। इससे रचनात्मकता और नवाचार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भारत में अभी कार्यस्थल निगरानी को लेकर कोई विशिष्ट कानून नहीं है। लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और अनुबंध कानून लागू होते हैं। डेटा संरक्षण विधेयक पारित होने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी।
कर्मचारी अपनी शिकायत श्रम विभाग या आंतरिक शिकायत समिति में दर्ज करा सकते हैं। अनुचित मांगों के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करना एक विकल्प है। कानूनी सलाह लेना भी उचित कदम हो सकता है। यह मामला कार्यस्थल पर निजता और विश्वास के महत्व को रेखांकित करता है। संगठनों को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। कर्मचारी कल्याण और व्यावसायिक जरूरतों के बीच संतुलन जरूरी है।
