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शिमला, 14 जुलाई। प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के राजस्व को सुरक्षित करने के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई शराब लाइसैंस धारक (ठेकेदार) निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी मासिक लाइसैंस फीस सरकारी खजाने में जमा करने में विफल रहता है तो आबकारी विभाग को उसका लाइसैंस रद्द करने और बकाया राशि की वसूली के लिए बैंक खाते फ्रीज करने का पूरा कानूनी अधिकार है। यह फैसला माननीय न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मैसर्ज कांडा वाइन और अन्य द्वारा दायर 2 रिट याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए सुनाया है।
याचिकाकर्त्ता फर्म मैसर्ज कांडा वाइन को वर्ष 2023-24 के लिए ऊना जिले के संतोषगढ़ यूनिट-3 में 9 शराब ठेकों और एक उप-ठेके का खुदरा लाइसैंस 9.20 करोड़ रुपए की बोली पर आबंटित किया गया था। वार्षिक आबकारी घोषणाओं की शर्त 2.42 के तहत ठेकेदार को हर महीने की लाइसैंस फीस अगले महीने की 7 तारीख तक जमा करनी अनिवार्य थी। जुलाई 2023 के बाद से याचिकाकर्त्ता ने राज्य में आई प्राकृतिक आपदा और पड़ोसी राज्य पंजाब में शराब की कम कीमतों का बहाना बनाकर लाइसैंस फीस जमा करना बंद कर दिया।
बार-बार नोटिस जारी करने और सुनवाई के कई मौके देने के बावजूद जब बकाया राशि जमा नहीं की गई तो आबकारी कलैक्टर ने 18 नवम्बर, 2023 को उनका लाइसैंस रद्द कर दिया और बकाया राजस्व की सुरक्षा के लिए फर्म के पार्टनर का बैंक खाता भी फ्रीज कर दिया था। इसके अलावा विभाग ने 2.80 करोड़ रुपए से अधिक की बकाया रिकवरी के लिए अन्य कथित सांझेदारों को भी 30 नवम्बर, 2023 को अंतिम नोटिस थमा दिया था। ठेकेदार ने विभाग की इस कार्रवाई और आबकारी नीति की शर्त 2.42 को मनमाना बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं और दस्तावेजों को देखने के बाद याचिकाकर्त्ता की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी कॉन्ट्रैक्टर ने खुली आंखों से नीलामी की शर्तों को स्वीकार कर टैंडर लिया है तो वह बाद में नुक्सान का हवाला देकर अपनी एक्सप्रैस संविदात्मक देनदारियों से पीछे नहीं हट सकता। खंडपीठ ने आबकारी नीति की शर्त 2.42 को संवैधानिक और कानून सम्मत ठहराते हुए विभाग द्वारा लाइसैंस निरस्त करने और बकाया वसूली की कार्रवाई को सही माना।
