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हिमाचल : गुटबाजी में उलझी कांग्रेस, CM सुक्खू और विक्रमादित्य की पसंद अलग अलग

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शिमला, 07 जनवरी। हिमाचल कांग्रेस में सब कुछ तय होते हुए भी दो जिलों में एक नाम तय नहीं हो पा रहा। शिमला ग्रामीण और किन्नौर अब सिर्फ संगठनात्मक जिले नहीं रहे, बल्कि सत्ता संतुलन की सबसे संवेदनशील प्रयोगशाला बन गए हैं।

जहां एक ओर कांग्रेस हाईकमान 11 जिलों में अध्यक्षों की नियुक्ति कर चुका है, वहीं इन दो जिलों में फाइलें दिल्ली में ही अटक गई हैं। वजह सिर्फ दावेदारों की भीड़ नहीं, बल्कि वो राजनीतिक खींचतान है, जिसमें CM का खेमा, होली लॉज और दिल्ली के सीधे संपर्क वाले चेहरे आमने-सामने खड़े हैं। यही कारण है कि शिमला ग्रामीण और किन्नौर में अध्यक्ष पद अब संगठन का नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का सवाल बन गया है।

शिमला ग्रामीण में हालात ये हैं कि यहां 25 से ज्यादा नेता खुद को अध्यक्ष की रेस में मान रहे हैं। लेकिन असली मुकाबला कुछ बड़े चेहरों के बीच सिमट गया है। सूत्रों के मुताबिक, यहां जो भी नाम फाइनल होगा, वह सीधे ये बताएगा कि दिल्ली में किस खेमे का पलड़ा भारी है। शिमला ग्रामीण में हर दावेदार एक खेमे का चेहरा है।अध्यक्ष पद की लड़ाई सिर्फ योग्यता की नहीं, बल्कि राजनीतिक लाइन की लड़ाई बन चुकी है। दीपक राठौर को राहुल गांधी की टीम से जुड़ा माना जाता है। दिल्ली में उनकी पकड़ को ही मौजूदा गतिरोध की सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है। 

महेंद्र स्तान को होली लॉज और खासकर मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बेहद करीब माना जाता है। रूपेश कंवल का नाम प्रतिभा सिंह की पसंद के तौर पर सामने आया है। सुधीर आज़ाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के करीबी माने जाते हैं और यूथ कांग्रेस के समय से उनके साथ जुड़े रहे हैं। यशपाल तनाइक की दावेदारी इसलिए मजबूत मानी जा रही है क्योंकि उनके नाम की पैरवी सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार कर रहे हैं। यानी यहां हर नाम किसी न किसी सत्ता केंद्र का प्रतिनिधि बन चुका है।

किन्नौर में तस्वीर और भी संवेदनशील है। यहां मुकाबला सिर्फ संगठन का नहीं, बल्कि पीढ़ियों और प्रभाव क्षेत्रों का बन गया है। मंत्री जगत सिंह नेगी अपने करीबी नेताओं उमेश नेगी, प्रेम कुमार और निर्मल चंद को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

वहीं दूसरी ओर, युवा कांग्रेस से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे निगम भंडारी खुद भी बड़े दावेदार हैं और राम सिंह नेगी का नाम भी आगे कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि इन दोनों धड़ों के बीच सहमति न बनने की वजह से हाईकमान किसी भी नाम पर अंतिम मुहर लगाने से बच रहा है। इस बार कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत जिला और ब्लॉक स्तर तक ऑब्जर्वर भेजे थे। इन्हीं रिपोर्ट्स के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष और 11 जिलों के अध्यक्ष तय हो चुके हैं। लेकिन शिमला ग्रामीण और किन्नौर ऐसे जिले बन गए हैं, जहां रिपोर्ट से ज्यादा राजनीतिक असर काम कर रहा है।

पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि अगर खेमेबाजी इसी तरह अटकी रही, तो हाईकमान किसी ऐसे चेहरे पर दांव लगा सकता है, जो किसी बड़े गुट का खुला प्रतिनिधि न हो। यानी इन दो जिलों में कांग्रेस संगठन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोग की तैयारी चल रही है।

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