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शिमला, 07 जनवरी। नगर निगम शिमला के महापौर का कार्यकाल बढ़ाने वाले मामले में हिमाचल हाईकोर्ट सख्त नजर आया है. हिमाचल हाईकोर्ट ने जवाब में देरी के चलते राज्य सरकार पर 50 हजार की कंडीशनल कॉस्ट लगाई है. ये आदेश मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति जियालाल भारद्वाज की खंडपीठ ने अपने लिखित ऑर्डर में दिए हैं. अदालत ने राज्य सरकार को दो दिनों के भीतर लंबित विसंगतियों का जवाब देने को कहा है.
हिमाचल हाईकोर्ट में MC शिमला के मेयर का कार्यकाल 5 साल करने को लेकर दिए गए अध्यादेश को चुनौती दी गई है. इस मामले पर हिमाचल हाईकोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई थी. हाईकोर्ट में दायर इस जनहित याचिका पर अब 24 फरवरी को अगली सुनवाई होनी है. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति जियालाल भारद्वाज की खंडपीठ ने अपने लिखित आदेशों में कहा कि समय की तात्कालिकता को देखते हुए राज्य अब तक अपने जवाब के ऑब्जेक्शन को रिफाइंड नहीं कर पाया है. ऐसे में राज्य पर दो दिनों के भीतर जवाब पुनः दाखिल न करने पर 50000 की कंडीशनल कॉस्ट लगाई जाती है. न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार दो दिनों के अंदर आपत्तियों पर अपना जवाब पुनः दायर करें ताकि समय रहते मामले का निपटारा किया जा सके.
'14 नवंबर 2025 को पूरा हो चुका है मेयर का कार्यकाल'
अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए रिप्लाई में दलील दी गई है कि शिमला नगर निगम के महापौर सुरेंद्र चौहान का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर लाए गए अध्यादेश की अवधि खत्म हो गई है. ऐसे में MC शिमला के मेयर का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर कोई कानून मौजूद नहीं है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुधीर ठाकुर कहते हैं कि विधानसभा के पटल पर रखे जाने के बाद 42 दिन के भीतर अध्यादेश कानूनी तौर पर समाप्त हो जाता है. ये अवधि पूरी हो चुकी है और मेयर के कार्यकाल को अढ़ाई वर्षों से अधिक करने वाला कोई कानून मौजूद नहीं है. उन्होंने कहा कि न्यायालय के सामने भी उन्होंने अपनी दलील रखी है और अदालत ने राज्य सरकार से स्टेटस रिपोर्ट देने को कहा है. सुधीर ठाकुर का कहना है कि पुराने एक्ट के तहत MC शिमला मेयर का कार्यकाल 14 नवंबर 2025 को पूरा हो चुका है. ऐसे में नगर निगम को शहर विकास विभाग द्वारा पहले जारी किए गए नोटिस के तहत चुनाव करवाने होंगे.
राज्यपाल की अनुमति के लिए भेजा गया है संशोधित विधेयक: स्टेट
वहीं इस मामले पर सरकार की ओर से कहा गया है कि मेयर का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर लाया गया अध्यादेश व्यवस्था के अनुसार 6 महीने के भीतर विधानसभा के समक्ष पेश कर दिया गया था. इस मामले पर विधानसभा से नया विधेयक पारित हो चुका है. अब नए कानून को राज्यपाल की ओर से मंजूरी दी जानी है. सरकार की दलील है कि मौजूदा परिस्थिति में ये याचिका अब मान्य नहीं रह गई है. वहीं याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अभी विधानसभा से पारित संशोधन को लोकभवन से मंजूरी नहीं मिली है अतः स्थिति बदली नहीं है.
