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हिमाचल : 6 लोगों की आबादी वाला गांव, BSNL ने पहुंचाया टावर, नेटवर्क से जुड़ा गांव

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लाहौल-स्पीति, 02 जनवरी। दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, लेकिन हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी में बसा काकती गांव अपनी अनोखी पहचान के कारण आज भी अलग नजर आता है। काजा से करीब 10 किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ी टीले पर स्थित यह गांव देश का इकलौता ऐसा राजस्व गांव है, जहां सिर्फ एक ही घर है।

सदियों से एकांत और सन्नाटे में जीवन जी रहे इस गांव ने अब डिजिटल युग में कदम रख दिया है। BSNL द्वारा स्थापित 4G टावर के बाद काकती गांव भी देश-दुनिया से मोबाइल नेटवर्क के जरिए जुड़ गया है।

काकती गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देश का पहला ऐसा राजस्व गांव है, जहां केवल एक ही घर मौजूद है। प्रशासनिक रिकॉर्ड में दर्ज इस तथ्य की पुष्टि ADC काजा शिखा सिमटिया ने भी की है। सरकारी दस्तावेजों में काकती गांव की कुल भूमि मात्र 15 बीघा दर्ज है और इसी जमीन पर 300 साल पुराना एक पारंपरिक मड हाउस खड़ा है। यही घर इस गांव की पहचान भी है और पूरी आबादी भी।

इस एकमात्र घर में एक ही परिवार की पांचवीं पीढ़ी निवास कर रही है। घर में दो भाई रहते हैं-छोटे भाई कलजंग टाकपा लामा, जबकि बड़े भाई छेरिंग नामगयल अपनी पत्नी रिंगजिन यूडन के साथ यहीं रहते हैं। परिवार में बेटे सोनम छोपेल लामा, विशेष आवश्यकता वाले नवांग ज्ञालसन और टैक्सी चालक नवांग कुंगा शामिल हैं। वर्तमान में परिवार के सभी बेटे बाहर हैं और पति-पत्नी इस विशाल सन्नाटे के बीच अकेले रहते हैं।

करीब तीन सौ साल पुराना यह मड हाउस मिट्टी और पत्थरों से बना है, जो हिमालयी वास्तुकला का बेहतरीन नमूना माना जाता है। गर्मियों में यह घर प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जबकि सर्दियों में भीतर की गर्मी को संजोकर रखता है। जब बाहर का तापमान शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता है, तब भी यह घर परिवार को सुरक्षित और अपेक्षाकृत गर्म आश्रय प्रदान करता है।

छेरिंग नामगयल बताते हैं कि पहले दुनिया की खबरें हफ्तों बाद मिलती थीं, लेकिन अब मोबाइल फोन के जरिए वे पल-पल की जानकारी पा सकते हैं। 4जी नेटवर्क आने से प्रशासनिक संपर्क, मौसम की जानकारी और बाहरी दुनिया से संवाद पहले से कहीं आसान हो गया है। हालांकि डिजिटल कनेक्टिविटी के बावजूद गांव की जीवनशैली आज भी बेहद सादगीपूर्ण और आत्मनिर्भर है।

परिवार का कहना है कि उन्हें शहरों की चकाचौंध बिल्कुल पसंद नहीं। कभी-कभार रिवालसर या नैनीताल जैसे स्थानों पर घूमने जरूर जाते हैं, लेकिन वहां भी अधिक दिन रुक नहीं पाते। हाल के वर्षों में गांव तक सड़क पहुंची है और बिजली भी आ गई है, फिर भी सर्दियों में जीवन आसान नहीं होता। करीब छह महीनों तक बर्फबारी के चलते गांव दुनिया से कट जाता है, इसलिए परिवार पहले से ही राशन और जरूरी सामान जमा कर लेता है।

काकती गांव तक पहुंचने के लिए दो प्रमुख मार्ग हैं। पहला रास्ता चंडीगढ़–मनाली–कुंजम–काजा होकर लगभग 512 किलोमीटर का है, जबकि दूसरा मार्ग चंडीगढ़–शिमला–किन्नौर–ताबो–काजा होकर करीब 635 किलोमीटर लंबा है। काजा में पर्यटकों के लिए होम-स्टे और होटल की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन काकती तक पहुंचना आज भी साहस और धैर्य की परीक्षा है।

स्पीति के लोग सिर्फ कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन जीने वाले नागरिक ही नहीं, बल्कि देश के असली प्रहरी भी हैं। कई गांव चीन सीमा से महज 10 से 15KM की दूरी पर बसे हैं। जहां लाहुल क्षेत्र के कई लोग आधुनिक सुविधाओं के कारण पलायन कर चुके हैं, वहीं स्पीति के लोग आज भी अपनी मातृभूमि से जुड़े हुए हैं। सीमांत इलाकों में रहकर देश की सीमाओं के पास बसना अपने-आप में राष्ट्र सेवा का उदाहरण है।

काकती गांव आज भी सादगी, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है। 4G नेटवर्क की दस्तक ने इसे डिजिटल दुनिया से जरूर जोड़ दिया है, लेकिन इसकी आत्मा अब भी उसी मिट्टी, पत्थर और सदियों पुराने संस्कारों में बसती है।

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