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शिमला, 02 जनवरी। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को लेकर एक अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच तलाक की डिक्री पारित हो जाने के बाद भी महिला अपने स्त्रीधन, उपहार और अन्य वैवाहिक संपत्तियों की वापसी के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है। तलाक हो जाने मात्र से महिला का यह अधिकार समाप्त नहीं होता।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने हमीरपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला की याचिका को खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत पति-पत्नी के बीच संपत्ति से जुड़े सभी विवादों की सुनवाई का विशेष अधिकार फैमिली कोर्ट को प्राप्त है, जो सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से भी ऊपर है। अदालत ने टिप्पणी की कि पक्षकारों को अलग-अलग मंचों पर लंबी और जटिल कानूनी लड़ाइयों में उलझाना न्यायसंगत नहीं है। न्याय की भावना यही है कि ऐसे मामलों का निपटारा फैमिली कोर्ट के माध्यम से ही किया जाए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों को अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दे और स्त्रीधन व संपत्ति की वापसी के मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाए। इसके लिए दोनों पक्षों को 17 फरवरी को फैमिली कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश दिए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि में बताया गया कि महिला ने अपने पति के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें वर्ष 2018 में उसे एकतरफा तलाक की डिक्री मिल गई थी। इसके साथ ही उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत अपने स्त्रीधन और विवाह के दौरान मिले उपहारों की वापसी के लिए आवेदन किया था, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने अब इस फैसले को पलटते हुए महिला को न्याय पाने का रास्ता साफ कर दिया है।
