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सिरमौर, 10 जनवरी। हिमाचल प्रदेश में हरिपुरधार की पहाड़ियों ने एक बार फिर मौत का मंजर देखा। माघी पर्व से ठीक दो दिन पहले हुए इस भीषण बस हादसे ने पूरे गिरिपार क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। एक तरफ जहां 12 यात्रियों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया, वहीं चार दर्जन से अधिक घायल हुए। इस त्रासदी के बीच शिमला जिला के चौपाल उपमंडल के गुम्मा क्षेत्र के बौहर गांव निवासी 18 वर्षीय अनीश ऐसा यात्री रहा, जिसने मौत को एक पल की दूरी से देखा।
इस हादसे ने हर किसी को को झकझोर दिया। 6 माह की मासूम गोद में ही बुझ गई, और 9 साल की दूसरी बच्ची भी जिंदगी की जंग हार गई। माघी से पहले ही दो आंगनों की किलकारियां हमेशा के लिए खामोश हो गई। कुपवी जाने के लिए बस में सवार अनीश ने बताया कि सफर सामान्य था। अचानक बस स्किड हुई और देखते ही देखते खाई में लुढ़क गई। एक क्षण ऐसा आया जब उसकी सांसें थम गईं। सौभाग्य से उसे पांव में हल्की चोट आई, लेकिन उसकी आंखों के सामने कई जिंदगियां हमेशा के लिए बुझ गईं। पुलिस ने भी अनीश के बयान दर्ज कर लिए हैं।
इस हादसे ने उस चेतावनी को सच साबित कर दिया, जो एक दिन पहले ही दी गई थी। हरिपुरधार के वरिष्ठ पत्रकार भीम सिंह ठाकुर ने दुर्घटना से ठीक एक दिन पहले अपने समाचार में जीरो प्वाइंट पर सड़क किनारे जमने वाले पाले को लेकर खतरे की ओर इशारा किया था। अफसोस, चेतावनी के बावजूद न तो पाले से निपटने के ठोस इंतजाम किए गए और न ही क्रैश बैरियर लगाए गए। नतीजा, एक भयानक हादसा।
हैरानी की बात यह है कि हरिपुरधार अस्पताल के हालात ऐसे थे कि एक भी घायल को रखने तक का इंतजाम नहीं था। ऐसे में लोगों में काफी गुस्सा देखने को मिला। गिरिपार और आसपास के पहाड़ी इलाकों में एक कड़वी सच्चाई बार-बार सामने आती है। जहां-जहां हादसे होते हैं, वहां मंदिर बन जाते हैं, लेकिन हादसों को रोकने की व्यवस्था नहीं बनती। सोलन–मिनस हाइवे हो या हरिपुरधार-नेरवा-कुपवी मार्ग, नौहराधार-संगड़ाह से लेकर रोनहाट-शिलाई तक अगर इन सड़कों पर बने मंदिरों की गिनती की जाए, तो संख्या सैकड़ों में पहुंच सकती है। ये मंदिर श्रद्धा के प्रतीक जरूर हैं, लेकिन साथ ही हर एक मंदिर एक अनसुनी चेतावनी भी है।
कुछ दिन पहले ही रोनहाट के पास एक युवक बाइक सहित टौंस नदी की ओर खड्ड में गिर गया था, जहां उसकी मौके पर ही मौत हो गई। अब हरिपुरधार का यह हादसा फिर से यही सवाल खड़ा कर रहा है, क्या पहाड़ों में मौत के बाद मंदिर बनाना ही समाधान है? बताया जा रहा है कि हादसे का शिकार बस ओवरलोड भी थी, जिसने खतरे को और बढ़ा दिया।
आज पूरे क्षेत्र में सिर्फ शोक नहीं, बल्कि एक टीस है, “काश समय रहते पाले से निपटने के उपाय होते, काश सड़कों पर सुरक्षा बैरियर लगे होते, तो शायद 14 घरों के चिराग यूं न बुझते। हरिपुरधार की यह त्रासदी अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पहाड़ों में सुरक्षित सफर की व्यवस्था पर लगा एक बड़ा सवालिया निशान बन चुकी है।
हरिपुरधार की यह त्रासदी अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही। यह पहाड़ों में सुरक्षित सफर की व्यवस्था पर लगा बड़ा सवालिया निशान बन चुकी है। 18 वर्षीय अनीश की आंखों देखी हमें बार-बार याद दिलाती है कि अगला मंदिर बनने से पहले, शायद एक जान बचाने की व्यवस्था बन जाये।
मानो हर बड़े हादसे के बाद सड़क किनारे एक मंदिर निर्माण एक परंपरा बन गया है। यह दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए की गई आस्था की अभिव्यक्ति तो है, लेकिन साथ ही दशकों से जारी व्यवस्था की नाकामी और अनसुनी चेतावनियों का मौन प्रमाण भी है। बहरहाल, हर हादसे के बाद वही रस्में दोहराई जाती हैं, मजिस्ट्रियल जांच का ऐलान, अस्पतालों में नेताओं की भीड़ और मुआवजे की घोषणाएं। मगर असली सवाल अब भी जस का तस है,क्या इन औपचारिकताओं से खोई हुई अनमोल जिंदगियां कभी लौटेंगी।
