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शिमला, 01 अगस्त। (अनिल) हिमाचल प्रदेश में एक समय ऐसा आया था जब लॉटरी ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया था। लोगों ने अपने घर तक गिरवी रख दिए, खेत बिक गए, बच्चों की पढ़ाई छूट गई, और सैकड़ों परिवार कर्ज में डूब गए। इन घटनाओं से व्यथित होकर वर्ष 1999 में हिमाचल की भाजपा सरकार ने, मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में, लॉटरी पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। यह फैसला “लॉटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998” की धारा 7, 8 और 9 के तहत लिया गया — ताकि हिमाचल की जनता को इस आर्थिक और मानसिक जुए की दलदल से बाहर निकाला जा सके।
लेकिन हैरानी की बात है कि आज कांग्रेस सरकार उसी बंद लॉटरी को फिर से वैध करने का रास्ता खोल रही है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और जनविरोधी निर्णय है। जिस व्यवस्था को सुधारने का वादा करके कांग्रेस सत्ता में आई थी, वही अब जनता को पुराने घावों की ओर धकेल रही है। कांग्रेस सरकार का यह फैसला न सिर्फ सामाजिक पतन को बढ़ावा देगा, बल्कि प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों को एक बार फिर भ्रम और लालच के रास्ते पर धकेलेगा।
पूर्व मंत्री डॉ. रामलाल मार्कडेय ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय किसी भी दृष्टिकोण से हितकारी नहीं है। सरकार को राजस्व के और साधन तलाशने चाहिए, न कि जनता को फिर से जुए की ओर धकेलना चाहिए। लॉटरी केवल एक खेल नहीं, यह एक धीमा ज़हर है जो परिवारों को धीरे-धीरे खोखला करता है।
प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए स्पष्ट किया है कि भाजपा ने जब लॉटरी बंद की थी, तो उसके पीछे जनता का दर्द और अनुभव था। आज उसी जनता को धोखा देकर कांग्रेस सरकार ने यह दिखा दिया है कि वह जनहित से ज्यादा अपने वित्तीय हितों की चिंता करती है।
यह फैसला सिर्फ कागज़ों पर नहीं, बल्कि समाज की नींव पर चोट करता है। इसे वापस लिया जाना चाहिए। भाजपा जनता के साथ मिलकर इस जनविरोधी निर्णय के विरुद्ध सड़क से विधानसभा तक संघर्ष करेगी।
प्रदेश की जनता ने वर्षों तक एक सामाजिक बुराई से मुक्ति का अनुभव किया था। 1999 में जब भाजपा सरकार ने हिमाचल में लॉटरी पर प्रतिबंध लगाया था, तो वह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था — वह जनता के जीवन में आई तबाही को समझकर उठाया गया एक मानवीय कदम था। उस समय अनेक परिवार ऐसे थे जिन्होंने लॉटरी में सब कुछ गंवा दिया था। घर बिक गए, रिश्ते टूटे, मानसिक बीमारियाँ फैलीं और सबसे अधिक नुकसान गरीब व मध्यम वर्ग को हुआ।
लॉटरी कोई साधारण गतिविधि नहीं, बल्कि लालच का जाल है। सरकारों का कर्तव्य जनता को उस जाल से बचाना होना चाहिए, न कि उसे फिर से उसी में उलझाना। लेकिन कांग्रेस सरकार ने बिल्कुल इसके विपरीत किया। सत्ता में आने के बाद ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के नाम पर जो बदलाव लाए गए हैं, वे सामाजिक मूल्य तोड़ने वाले साबित हो रहे हैं। लॉटरी को फिर से वैध करना इसी का ताजा उदाहरण है।
पूर्व मंत्री डॉ. रामलाल मार्कडेय ने कहा है कि कांग्रेस सरकार ने जनता की याददाश्त को कमज़ोर समझा है, लेकिन लोग अब भी भूले नहीं हैं कि कैसे लॉटरी के नाम पर उनका सबकुछ लूट लिया गया था। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस निर्णय को तुरंत रद्द किया जाए और जनभावनाओं का सम्मान किया जाए।
वहीं नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर ने सरकार के इस कदम को ‘आर्थिक लूट का वैधानिक लाइसेंस’ बताते हुए कहा कि यह कांग्रेस की गिरती नैतिकता और नीति विहीन शासन का उदाहरण है। उन्होंने चेताया कि यदि यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो भाजपा जनआंदोलन खड़ा करने से पीछे नहीं हटेगी।
यह समय है जनता को एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करने का — ताकि लॉटरी जैसे विनाशकारी प्रयोग दोबारा हमारे समाज में जगह न बना सकें। कांग्रेस सरकार को यह समझना होगा कि शासक होने का मतलब जनता को दिशा देना है, उन्हें गुमराह करना नहीं।