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शिमला, 06 नवंबर। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लिए गए ऋण के भुगतान के लिए अपने एक कर्मचारी का वेतन कुर्क करने के आदेश पर हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक की किसी दंडात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब वसूली कार्यवाही के खिलाफ दायर अपील लंबित थी, तब अधिकारियों को संयम बरतना चाहिए था।
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने पुनीत नेगी द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड और अन्य उत्तरदाताओं के खिलाफ दायर याचिका का निस्तारण करते हुए गुरुवार को यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने अपर रजिस्ट्रार (निगरानी), सहकारी समितियां, हिमाचल प्रदेश को निर्देश दिया कि वे 31 मार्च 2026 के निर्णय (पुरस्कार) के खिलाफ लंबित नेगी की अपील पर प्राथमिकता के आधार पर दो महीने के भीतर निर्णय लें।
न्यायालय ने आदेश दिया कि अपील के निस्तारण तक 13 अक्टूबर और 5 अगस्त 2026 के विवादित आदेशों के अनुपालन में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। याचिका के अनुसार, पुनीत नेगी ने एक अन्य व्यक्ति के लिए गारंटर (जमानती) के रूप में काम किया था, जिसने बैंक से कर्ज लिया था। इसे चुकाने में चूक के बाद, मूल उधारकर्ता और गारंटर दोनों के खिलाफ वसूली की कार्यवाही शुरू कर दी गई। सहकारी बैंक के कलेक्टर (वसूली) ने 2 मई 2025 को आदेश पारित कर नेगी के वेतन को कुर्क करने का निर्देश दिया था। तब याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1968 की धारा 72 और 73 के तहत सक्षम प्राधिकारी से संपर्क किया।
हालांकि, उनकी मध्यस्थता याचिका 31 मार्च 2026 के एक आदेश के तहत खारिज कर दी गई थी। नेगी ने बाद में इस आदेश को चुनौती देते हुए अपर रजिस्ट्रार (निगरानी) के समक्ष अपील दायर की, जो वर्तमान में विचाराधीन है। अपील लंबित रहने के दौरान, अपीलीय प्राधिकारी ने 5 अगस्त 2026 के आदेश के माध्यम से मामले की आगे की कार्यवाही को एक अन्य रिट याचिका का फैसला होने तक स्थगित रखने का निर्देश दिया था। लेकिन इसके साथ ही 2 मई 2025 के वेतन कुर्की के आदेश के खिलाफ दी गई अंतरिम रोक को भी हटा लिया गया। इसके बाद कलेक्टर (वसूली) ने 13 अक्टूबर 2026 के संशोधित आदेश के जरिए याचिकाकर्ता के वेतन से हर महीने 40,000 रुपये काटने का निर्देश जारी कर दिया।
नेगी ने इन आदेशों को रद्द करने और अपील के निस्तारण तक वसूली कार्यवाही से सुरक्षा की मांग को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान बैंक के वकील ने सहमति व्यक्त की कि अपीलीय प्राधिकारी को निश्चित समय सीमा में निर्णय लेने का निर्देश दिया जा सकता है और तब तक कुर्की के आदेश पर रोक बनी रह सकती है। उच्च न्यायालय ने पाया कि चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जा चुका था, इसलिए कुर्की आदेश जारी करने वाले अधिकारियों को अपील पर फैसला आने तक संयम बरतना चाहिए था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह इन दिशा-निर्देशों को जारी करते हुए विवाद के गुण-दोष की जांच नहीं कर रहा है।
