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शिमला, 25 अप्रैल। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा शामिल थे, ने राज्य के कर्मचारियों के हक में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी (भर्ती और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 2024 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए इसके उन हिस्सों को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जो कर्मचारियों के सेवा लाभों में कटौती कर रहे थे। इस मामले की अंतिम सुनवाई 5 जनवरी 2026 को पूरी हुई थी, जिसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
विवाद की मुख्य जड़ सरकार द्वारा बनाया गया वह नया कानून था, जिसके जरिए अनुबंध (Contract) के आधार पर की गई सेवा को वरिष्ठता और वित्तीय लाभों के लिए गिनने से रोका जा रहा था। कर्मचारियों ने अदालत में दलील दी कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। साथ ही, यह आरोप भी लगाया गया कि सरकार इस कानून के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के उन पुराने आदेशों को पलटने का प्रयास कर रही है, जो अनुबंध सेवा को सेवाकाल का हिस्सा मानने की अनुमति देते थे।
यद्यपि राज्य सरकार ने दलील दी थी कि इस अधिनियम का लक्ष्य नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच के अंतर को स्पष्ट करना है, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट तौर पर अधिनियम के उन प्रावधानों को खारिज कर दिया जो 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के अधिकारों को कम करते थे। इस निर्णय से अब साफ हो गया है कि सरकार कानून बनाकर कर्मचारियों के उन लाभों को नहीं छीन सकती जो उन्हें न्यायिक आदेशों के तहत प्राप्त हुए थे।
