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शिमला, 10 मार्च। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश में 422 बस रूटों के प्रस्तावित आवंटन से जुड़े मामले में बड़ा अंतरिम आदेश देते हुए रीजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटीज़ (आरटीए) की उस बैठक के एजेंडे पर रोक लगा दी है, जिसमें इन रूटों के आवंटन पर चर्चा होनी थी। यह बैठक 11 मार्च को प्रस्तावित थी।
मामले की सुनवाई न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत में हुई। अदालत ने सोलन के जय मां शूलिनी निजी बस संचालक संघ द्वारा दायर याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किए। अदालत ने फिलहाल आरटीए को उस एजेंडे पर आगे बढ़ने से रोक दिया है, जिसमें कथित तौर पर हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) द्वारा सरेंडर किए गए 422 बस रूटों को निजी ऑपरेटरों को देने का प्रस्ताव रखा गया था।
यह मामला परिवहन विभाग द्वारा जारी उस कार्यालय आदेश से जुड़ा है, जिसमें एचआरटीसी के कथित तौर पर सरेंडर किए गए 422 स्टेज कैरिज रूटों के लिए निजी बस संचालकों से आवेदन मांगे गए थे। याचिकाकर्ता संघ का कहना है कि हिमाचल प्रदेश के निदेशक परिवहन ने राज्य के सभी रीजनल ट्रांसपोर्ट अधिकारियों को एक कार्यालय आदेश जारी किया था, जिसमें इन रूटों के प्रकाशन और उनके दोबारा आवंटन की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दी गई थी।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस प्रक्रिया में वर्ष 2014 की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में तय 60:40 के अनुपात की शर्तों में ढील दी गई है। इस नीति के तहत बस रूटों के संचालन में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच एक निश्चित अनुपात तय किया गया था। संघ का कहना है कि इस अनुपात को दरकिनार करते हुए निजी ऑपरेटरों के पक्ष में इन रूटों को दोबारा आवंटित करने की तैयारी की जा रही है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि जिन 422 रूटों को एचआरटीसी द्वारा सरेंडर किया हुआ बताया जा रहा है, वे वास्तव में नियमित रूप से स्वीकृत रूट ही नहीं थे। आरोप लगाया गया है कि एचआरटीसी इनमें से ज्यादातर रूटों पर अस्थायी परमिट के आधार पर बसें चला रहा था। इसलिए इन्हें सरेंडर किए गए स्थायी रूट बताकर दोबारा आवंटन की प्रक्रिया शुरू करना सही नहीं है।
संघ ने यह भी आरोप लगाया है कि एचआरटीसी ने अपने किसी भी रूट परमिट को औपचारिक रूप से परिवहन विभाग के कार्यालय में जमा नहीं किया था। इसके बावजूद इन रूटों को सरेंडर दिखाकर आरटीए की बैठक में उनका पुनः आवंटन करने का एजेंडा लाया जा रहा था। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि इस एजेंडे पर आगे कार्रवाई होती है तो इससे निजी बस संचालकों के साथ बड़ा अन्याय और भेदभाव होगा।
