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शिमला, 01 फरवरी। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने केंद्रीय बजट 2026-27 को हिमाचल प्रदेश के लिए निराशाजनक, अन्यायपूर्ण और पहाड़ी राज्यों की अनदेखी करने वाला करार दिया है। आज यहां आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह बजट आम जनता, मध्यम वर्ग, किसानों, बागवानों और विशेष रूप से पर्वतीय राज्यों की वास्तविक जरूरतों के प्रति केंद्र सरकार की उदासीनता को उजागर करता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के लोगों को इस बजट से बड़ी उम्मीदें थीं, खासकर मध्यम वर्ग को आयकर में राहत की अपेक्षा थी, लेकिन बढ़ती महंगाई और आर्थिक दबावों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत दिए जाने वाले राज्य-विशेष राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को बंद किए जाने पर गहरी चिंता जताई।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1952 से लेकर 15वें वित्त आयोग तक राज्यों को नियमित रूप से राजस्व घाटा अनुदान मिलता रहा है, लेकिन 16वें वित्त आयोग द्वारा इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। 15वें वित्त आयोग के दौरान हिमाचल को लगभग 37,000 करोड़ रुपये का आरडीजी मिला था। यहां तक कि 14वें और 15वें वित्त आयोग के बीच अंतरिम अवधि में भी पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल में 11,431 करोड़ रुपये की सहायता दी गई थी।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि 16वें वित्त आयोग द्वारा छोटे और पहाड़ी राज्यों के लिए आरडीजी की सिफारिश न करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह निर्णय हिमाचल की संरचनात्मक वित्तीय चुनौतियों, 67 प्रतिशत से अधिक वन एवं पारिस्थितिक आवरण, पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक सेवा वितरण लागत तथा हाल के वर्षों में 15,000 करोड़ रुपये से अधिक के प्राकृतिक आपदा नुकसान की पूरी तरह उपेक्षा करता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि आरडीजी की समाप्ति से राज्य की वित्तीय स्थिरता, सार्वजनिक सेवाओं और विकासात्मक निवेश पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा तथा राज्य को बढ़ते कर्ज और सेवा वितरण के बीच कठिन निर्णय लेने पड़ेंगे। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बार-बार ज्ञापन और तकनीकी प्रस्तुतियां देने के बावजूद केंद्र सरकार और वित्त आयोग ने हिमाचल की वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया, जिससे यह आशंका और मजबूत होती है कि भाजपा शासित केंद्र सरकार कांग्रेस शासित राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए किए गए प्रावधान हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए अपर्याप्त हैं। सेब उत्पादक, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देते हैं और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं, उन्हें बजट में कोई विशेष सहायता या नीति समर्थन नहीं मिला, जो बागवानों के साथ सीधा अन्याय है।
पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने निराशा जताई। उन्होंने कहा कि पर्यटन हिमाचल की पहचान और रोजगार का प्रमुख स्रोत है, लेकिन बजट में इसके लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व-प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल को इससे बाहर रखना स्पष्ट भेदभाव दर्शाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भानुपल्ली–बिलासपुर और बद्दी–चंडीगढ़ जैसी महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाओं के लिए भी कोई आवंटन नहीं किया गया। उन्होंने राज्यों की ऋण सीमा को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग दोहराई।
उन्होंने कहा कि पूंजी निवेश की बात तो की गई है, लेकिन पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा सुरक्षा, सड़क-रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस सहायता नहीं दिखती। साथ ही, ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा 1.5 लाख करोड़ रुपये तक ही सीमित रखी गई है और जीएसटी मुआवजा बंद होने से राज्य को हर वर्ष भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि केंद्रीय बजट 2026-27 जन-विरोधी, किसान-विरोधी और हिमाचल-विरोधी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक दक्षता के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन केंद्र सरकार से संवाद, संवेदनशीलता और सहकारी संघीयता की भावना अपनाने की अपेक्षा करती है। हिमाचल प्रदेश को नजरअंदाज कर देश का समावेशी विकास संभव नहीं है और प्रदेश सरकार इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज मजबूती से उठाती रहेगी।
