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शिमला, 08 फरवरी। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को समाप्त करना किसी सरकार का नहीं, बल्कि राज्य की जनता के अधिकारों का मुद्दा है। यदि आरडीजी का प्रावधान खत्म किया गया तो हिमाचल प्रदेश के अधिकारों की रक्षा करना कठिन हो जाएगा। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर वे भाजपा सांसदों और विधायकों के साथ दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने को भी तैयार हैं।
आज यहां वित्त विभाग द्वारा राज्य की वित्तीय स्थिति और आरडीजी समाप्ति के प्रभावों पर दी गई प्रस्तुति के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट का राज्य की अर्थव्यवस्था और आगामी बजट पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने खेद जताया कि इस अहम प्रस्तुति के लिए आमंत्रण के बावजूद भाजपा विधायक उपस्थित नहीं हुए, जबकि उन्हें राज्य की वास्तविक वित्तीय स्थिति को समझना चाहिए था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के 17 राज्यों के लिए आरडीजी समाप्त की जा चुकी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश पर इसका सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, क्योंकि राज्य के बजट का 12.7 प्रतिशत हिस्सा आरडीजी से आता है। उन्होंने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य की कर संग्रह दर 13–14 प्रतिशत से घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है। चूंकि हिमाचल एक उत्पादक राज्य है और जीएसटी उपभोग आधारित कर है, इसलिए इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि सभी को मिलकर प्रदेश के हितों के लिए संघर्ष करना होगा। उन्होंने मांग की कि जिन बिजली परियोजनाओं ने अपना ऋण चुका दिया है, उन पर राज्य को कम से कम 50 प्रतिशत रॉयल्टी मिलनी चाहिए तथा जिन परियोजनाओं के 40 वर्ष पूरे हो चुके हैं, उन्हें राज्य को लौटाया जाए। उन्होंने बताया कि भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड से 2012 से अब तक 4500 करोड़ रुपये की बकाया राशि राज्य को नहीं मिली है, जबकि इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी आ चुका है। शानन पावर प्रोजेक्ट की लीज समाप्त हो चुकी है और इसे वापस लेने के लिए राज्य कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य पर कार्य कर रही है। सरकार ने अपने संसाधनों से 26,683 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है, लेकिन सीमित संसाधनों—नदियां, वन संपदा और पर्यटन—के कारण यह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने प्रदेशवासियों को आश्वस्त किया कि आम आदमी पर बोझ डाले बिना संसाधन बढ़ाने, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने और राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
उन्होंने बताया कि 16वें वित्त आयोग के समक्ष वन क्षेत्र और भूस्खलन जैसी आपदाओं को विशेष सहायता के दायरे में लाने का मामला उठाया गया, जिसे आयोग ने स्वीकार किया है।
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के प्रभावों पर मंत्रिमंडल में विस्तृत चर्चा की जा चुकी है और वित्त विभाग द्वारा दिए गए सुझावों पर अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल लेगा।
वित्त विभाग के प्रधान सचिव देवेश कुमार ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत आरडीजी का प्रावधान 15वें वित्त आयोग तक राज्य को मिलता रहा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में राज्य की अपनी आय लगभग 18,000 करोड़ रुपये है, जबकि प्रतिबद्ध व्यय लगभग 48,000 करोड़ रुपये है। आरडीजी समाप्त होने से वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 6,000 करोड़ रुपये का गंभीर संसाधन अंतर उत्पन्न हो गया है।
उन्होंने चेतावनी दी कि इन सिफारिशों का प्रभाव केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली सरकारों पर भी पड़ेगा और यह हिमाचल प्रदेश की जनता के साथ गंभीर अन्याय होगा।
