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इंटरनेशनल डेस्क, 09 फरवरी। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील पर बातचीत तेज है, लेकिन इसके साइड-इफेक्ट्स आम लोगों की जेब तक पहुंच सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत भारत के सामने एक कड़ा संदेश रखा है- रूस से तेल खरीद घटाओ या बंद करो, और बदले में अमेरिका व वेनेजुएला से आयात बढ़ाओ। चेतावनी भी साफ है: शर्त न मानी तो 25 फीसदी टैरिफ दोबारा लगाया जा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर भारत अमेरिकी दबाव में आकर तेल आयात का रास्ता बदलता है, तो क्या पेट्रोल-डीजल और महंगे होंगे?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। बीते कुछ वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बनकर उभरा, जहां से कुल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा आता रहा। हालांकि अब हालात बदल रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस से पूरी तरह दूरी बनाना आसान नहीं है, लेकिन कटौती की शुरुआत हो चुकी है।
रॉयटर्स के मुताबिक, सरकारी रिफाइनरियां जैसे इंडियन ऑयल और HPCL अब वेनेजुएला से सप्लाई की संभावनाएं तलाश रही हैं। वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस से तेल खरीद रोककर वेनेजुएला से बड़ी खेप का ऑर्डर दे दिया है।
यह मामला सिर्फ कूटनीति का नहीं, तकनीकी गणित का भी है। अमेरिकी शेल ऑयल हल्का होता है, जिसे गैस कंडेनसेट कैटेगरी में रखा जाता है। इसके उलट रूस का यूराल क्रूड भारी और ज्यादा सल्फर वाला होता है। भारत की कई रिफाइनरियां खास तौर पर इसी भारी रूसी तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई हैं। ऐसे में अमेरिकी तेल को सीधे इस्तेमाल करना मुश्किल है। इसके लिए अलग-अलग ग्रेड के तेलों के साथ ब्लेंडिंग करनी पड़ेगी, जो समय लेने के साथ-साथ खर्चीला भी है।
रूस भारत को लंबे समय से कच्चे तेल पर मोटी छूट देता आ रहा है। पहले जहां यह डिस्काउंट 7–8 डॉलर प्रति बैरल था, अब यह 11 डॉलर तक पहुंच चुका है। यानी रूसी तेल भारत के लिए सस्ता सौदा रहा है। इसके उलट अमेरिकी कच्चा तेल कहीं महंगा पड़ता है। एनर्जी डेटा फर्मों का अनुमान है कि अगर भारत रूसी तेल छोड़कर अमेरिकी तेल अपनाता है, तो रिफाइनरियों को प्रति बैरल कम से कम 7 डॉलर ज्यादा चुकाने होंगे। साथ ही अमेरिका से भारत तक लंबी दूरी के कारण शिपिंग टाइम और ट्रांसपोर्ट खर्च भी बढ़ेगा।
जब रिफाइनरियों की लागत बढ़ेगी, तो उसका बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं पर ही आएगा। यानी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाली एजेंसियों का कहना है कि रूस से तेल खरीद अचानक रोकना भारत के लिए सिर्फ व्यापारिक जोखिम नहीं होगा, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक और रणनीतिक सिरदर्द भी बन सकता है।
