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शिमला, 20 जनवरी। हिमाचल प्रदेश की सियासत में बड़ा भूचाल ला चुका CPS मामला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। हाईकोर्ट से असंवैधानिक करार दिए जा चुके मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद अब 16 मार्च को संभावित फाइनल हियरिंग तय की गई है। इस सुनवाई पर सिर्फ CPS पदों की वापसी ही नहीं, बल्कि कुछ विधायकों की सदस्यता पर भी भविष्य टिका हुआ है।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद अदालत ने संकेत दिए हैं कि इस मामले में 16 मार्च को अंतिम सुनवाई हो सकती है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें CPS की नियुक्तियों को असंवैधानिक बताते हुए पूरे CPS एक्ट को रद्द कर दिया गया था।
हिमाचल हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2025 को बड़ा फैसला सुनाते हुए हिमाचल संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ते, शक्तियां, विशेषाधिकार और सुविधाएं) अधिनियम, 2006 को निरस्त कर दिया था। अदालत ने CPS की नियुक्तियों को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद सभी CPS पद से हटा दिए गए थे और उनसे सरकारी गाड़ियां, दफ्तर और स्टाफ जैसी सुविधाएं वापस ले ली गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अब हिमाचल के CPS केस को छत्तीसगढ़, पंजाब और पश्चिम बंगाल के CPS मामलों के साथ जोड़ दिया है। इन सभी राज्यों में CPS की संवैधानिकता को लेकर पहले से ही मुकदमे लंबित हैं। इसके साथ ही अदालत ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर करने वाले पक्षों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर राज्य सरकार की अपील पर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
पिछली सुनवाई में प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि हाईकोर्ट को किसी कानून को रद्द करने का अधिकार नहीं था। सरकार का तर्क रहा कि हिमाचल का CPS एक्ट असम जैसे राज्यों से अलग है। हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कानून को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया।
CM सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अर्की से संजय अवस्थी, बैजनाथ से किशोरी लाल, रोहड़ू से मोहन लाल ब्राक्टा, पालमपुर से आशीष बुटेल, दून से राम कुमार चौधरी और कुल्लू से सुंदर सिंह ठाकुर को CPS नियुक्त किया था। इन सभी को अलग-अलग मंत्रियों के साथ अटैच किया गया था। हालांकि इनके पास फाइलों पर हस्ताक्षर की शक्तियां नहीं थीं, लेकिन सुविधाएं लगभग मंत्रियों जैसी दी गई थीं।
CPS नियुक्तियों को हिमाचल हाईकोर्ट में कल्पना नाम की महिला, BJP के 11 विधायक और पीपल फॉर रिस्पॉन्सिबल गवर्नेंस संस्था ने चुनौती दी थी। याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के तहत किसी भी राज्य में मंत्रियों की संख्या विधानसभा के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।
हिमाचल विधानसभा में 68 विधायक हैं, ऐसे में प्रदेश में अधिकतम 12 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित 11 मंत्री हैं। CPS जोड़ने पर यह संख्या 17 हो जाती है। इसी आधार पर अदालत में यह मामला उठाया गया था कि CPS नियुक्तियां संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन हैं।
