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सिरमौर, 11 जनवरी। हिमाचल प्रदेश स्थित सिरमौर जिला के हरिपुरधार की पहाड़ियों ने 9 जनवरी को सिर्फ एक सड़क हादसा नहीं देखा, उन्होंने कई घरों के सपने टूटते देखे, बच्चों की हंसी बुझते देखी और मां-बाप की छाया एक झटके में मिटते देखी। इसी बस हादसे में कुपवी तहसील के गांव बौरा का एक छोटा-सा परिवार भी हमेशा के लिए खत्म हो गया। पति-पत्नी की एक साथ मौत ने पीछे छोड़ दिया तीन साल का मासूम, जिसके लिए अब मां और पापा सिर्फ तस्वीरों और यादों में रह गए हैं।
गांव बौरा निवासी रमेश सिंह और उनकी पत्नी साक्षी बेहद साधारण जिंदगी जीते थे। ज्यादा साधन नहीं थे, लेकिन चेहरे पर संतोष था। रमेश मेहनत करके अपने बच्चे का भविष्य संवारना चाहता था, जबकि साक्षी उसी छोटे से घर को खुशियों से भरकर रखती थी। उनका तीन साल का बेटा उनकी पूरी दुनिया था। उसी की हंसी में उनका कल बसता था। किसे पता था कि जिस सफर पर वे निकले हैं, वही सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगा।
हरिपुरधार के पास निजी बस के खाई में गिरते ही कई परिवारों की दुनिया उजड़ गई। रमेश और साक्षी को भी बचाया नहीं जा सका। यह सिर्फ दो मौतें नहीं थीं, यह एक पूरे घर का खत्म हो जाना था। एक ऐसा घर, जहां सुबह बच्चे की किलकारी गूंजती थी और शाम मां-बाप के इंतजार में बीतती थी।
आज रमेश और साक्षी का बेटा यह भी नहीं जानता कि उसके जीवन में क्या टूट गया है। वह दरवाजे की तरफ देखता है, जैसे अभी मां आएगी, अभी पापा बुलाएंगे। उसकी आंखों में सवाल हैं, जिनका कोई जवाब आसान नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल उसके भविष्य का है जिसे मां-बाप की नहीं, पूरे समाज की जरूरत है।
जब दोनों के शव गांव पहुंचे, तो बौरा में सन्नाटा उतर आया। शनिवार को अंतिम संस्कार के दौरान हर आंख नम थी। लोग कुछ कह नहीं पा रहे थे, बस एक-दूसरे का कंधा थामे खड़े थे। गांव वालों का कहना था कि रमेश-साक्षी जैसे सीधे और मेहनती लोग किसी के लिए बोझ नहीं थे, बल्कि हर किसी के अपने थे।
हरिपुरधार का यह दर्द सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन सड़कों, उन बसों और उस सिस्टम पर भी सवाल है, जहां जरा-सी चूक पूरी जिंदगी निगल जाती है। पहाड़ों में हर सफर सिर्फ दूरी नहीं, जिम्मेदारी भी मांगता है।
