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हिमाचल के फार्मा उद्योग में बड़ा संकट, कई लोगों की जा सकती है नौकरी, इतने उद्योग होंगे बंद

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न्यूज अपडेट्स 
शिमला, 02 जनवरी। नया साल जहां आम लोगों के लिए नई उम्मीदें और खुशियां लेकर आया है, वहीं हिमाचल प्रदेश के दवा उद्योगों के लिए 2026 की शुरुआत चिंता और अनिश्चितता से भरी नजर आ रही है। केंद्र सरकार की सख्त डेडलाइन खत्म होते ही प्रदेश की फार्मा इंडस्ट्री पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि हिमाचल में करीब 500 दवा उद्योगों पर ताला लटक सकता है, जिससे हजारों परिवारों की रोजी.रोटी पर असर पड़ने की आशंका है।

रिवाइज्ड शेड्यूल की डेडलाइन खत्म

बता दें कि हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मा हब के रूप में जाना जाता है, लेकिन नए साल की शुरुआत के साथ ही यह पहचान खतरे में पड़ती नजर आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए रिवाइज्ड शेड्यूल के मानकों को पूरा करने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर को समाप्त हो चुकी है। समय सीमा खत्म होते ही राज्य के दवा उद्योगों में हड़कंप मच गया है।

बंद हो सकते हैं 500 उद्योग

प्रदेश के बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, ऊना, सोलन और पांवटा साहिब जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में सैकड़ों फार्मा यूनिट्स संचालित हैं। इन इकाइयों से न केवल राज्य को बड़ा राजस्व मिलता है, बल्कि हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिला हुआ है। अब आशंका जताई जा रही है कि मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण करीब 500 दवा कंपनियां बंद हो सकती हैं, जिससे लगभग 50 हजार से अधिक लोग बेरोजगार हो सकते हैं।

क्या है केंद्र का रिवाइज्ड शेड्यूल

दरअसल केंद्र सरकार ने फार्मा कंपनियों के लिए रिवाइज्ड शेड्यूल "M" फॉर्म लागू किया है। यह  रिवाइज्ड शेड्यूल दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस का सख्त संस्करण है। इसके तहत आधुनिक मशीनरी, माइक्रो लैब, एयर हैंडलिंग सिस्टम, बेहतर वाटर सिस्टम और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ अनिवार्य किया गया है। सरकार का उद्देश्य है कि देश में बनने वाली दवाएं अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों।

हिमाचल के फार्मा उद्योग के लिए चुनौती

हालांकि, हिमाचल की ज्यादातर फार्मा यूनिट्स MSME श्रेणी की हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जमीन की कमी और भारी निवेश है। नए नियमों के तहत अलग.अलग दवा सेक्शन के लिए ज्यादा जगह जरूरी है, जबकि कई यूनिट्स सीमित क्षेत्र में स्थापित हैं। ऐसे में कई उद्योग या तो उत्पादन घटाने की तैयारी कर रहे हैं या फिर बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं।

31 दिसंबर थी डेडलाइन

केंद्र सरकार के अधीन आते केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन  (CDSCO)  ने करीब डेढ़ साल पहले रिवाइज्ड "M" फॉर्म लागू किया। जिसके बाद इसे लागू करने के लिए 31 दिसंबर 2025 तक का टाइम दिया गया। अब बीते रोज डेडलाइन खत्म होने के बाद केंद्रीय और राज्य ड्रग कंट्रोल विभाग ने निरीक्षण तेज कर दिए हैं। जो यूनिट्स मानक पूरा नहीं कर पा रही हैं, उन्हें नोटिस जारी किए जा रहे हैं और कई जगहों पर उत्पादन अस्थायी रूप से रोका भी गया है। उद्योग संगठनों का कहना है कि वे नियमों का पालन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए कम से कम एक साल का अतिरिक्त समय जरूरी है।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राहत नहीं मिली तो इसका असर सिर्फ रोजगार पर ही नहींए बल्कि दवाओं की सप्लाई चेन पर भी पड़ेगा। इससे दवाओं की कीमतें बढ़ने और बाजार में कुछ जरूरी दवाओं की कमी की स्थिति भी बन सकती है। नए साल की शुरुआत में जहां जश्न का माहौल होना चाहिए थाए वहीं हिमाचल के दवा उद्योग आज भविष्य को लेकर असमंजस में खड़े नजर आ रहे हैं।

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