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शिमला, 21 जुलाई। प्रदेश हाईकोर्ट ने महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की दिशा में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पहली पत्नी की मौजूदगी में किया गया दूसरा विवाह कानूनन भले ही अमान्य हो, लेकिन उसे 'अनैतिक' नहीं ठहराया जा सकता। अतः एक आदर्श और संवेदनशील नियोक्ता होने के नाते सरकार वित्तीय रूप से कमजोर और आश्रित दूसरी पत्नी को पारिवारिक पैंशन के लाभ से वंचित नहीं कर सकती।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंदर नेगी की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा दायर राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए दिया है।
यह कानूनी विवाद उर्मिला देवी नामक महिला की पारिवारिक पैंशन से जुड़ा है। याचिकाकर्त्ता उर्मिला देवी का विवाह 3 अप्रैल 1987 को एक सरकारी कर्मचारी के साथ हुआ था। हालांकि इस विवाह के समय कर्मचारी की पहली पत्नी (रेशमू देवी) जीवित थीं, जिससे यह शादी तकनीकी रूप से द्विविवाह के दायरे में आती थी। इस शादी से उर्मिला देवी के दो बेटे भी हुए जो अब करीब 25 वर्ष के हो चुके हैं। कर्मचारी की मृत्यु के बाद जब उर्मिला देवी ने पैंशन के लिए आवेदन किया, तो पैंशन विभाग ने 18 फरवरी 2022 को एक आदेश जारी कर उनका दावा खारिज कर दिया।
विभाग की दलील थी कि सैंट्रल सिविल सर्विसेज पैंशन रूल्स, 1972 के नियम 54 (13) के तहत ऐसी दूसरी शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती। इसके खिलाफ उर्मिला देवी ने हाईकोर्ट की सिंगल बैंच में याचिका दायर की थी, जिसने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को खंडपीठ में चुनौती दी थी। खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया।
