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हिमाचल: अदालत के आदेशों को हल्के में लेने पर सरकार के मुख्य सचिव हाइकोर्ट तलब

Anil Kashyap
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न्यूज अपडेट्स 
शिमला, 22 मार्च। प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालत के आदेशों को सरकारी विभागों द्वारा हल्के में लेने पर कड़ा संज्ञान लेते हुए मुख्य सचिव को कोर्ट में तलब करने के आदेश जारी किए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने डॉ. शेखर शर्मा द्वारा दायर अनुपालना याचिका की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य सचिव द्वारा महाधिवक्ता कार्यालय के माध्यम से भेजी गई हिदायत का अवलोकन करने के पश्चात यह आदेश जारी किए। कोर्ट ने प्रधान सचिव स्वास्थ्य को भी कोर्ट में उपस्थित रहने के आदेश दिए हैं। 

कोर्ट ने कहा कि हिदायत में इस्तेमाल की गई अपमानजनक भाषा के मद्देनजर, कम से कम हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रिंसीपल सैक्रेटरी (स्वास्थ्य) रैंक तक का अधिकारी इस कृत्य के लिए अदालत में बिना शर्त माफी मांगे। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख पर, हिमाचल प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव और प्रिंसीपल सैक्रेटरी (स्वास्थ्य) दोनों अदालत में मौजूद रहने को कहा है, ताकि अदालत उनके साथ इस मामले पर चर्चा कर सके और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। कोर्ट ने कहा कि उक्त हिदायत को देखने से पता चलता है कि उसमें इस्तेमाल की गई भाषा न केवल अवमाननापूर्ण है, बल्कि अपमानजनक भी है।

कोर्ट ने कहा है कि असल में, अब समय आ गया है कि हाई कोर्ट अधिकारियों को यह संदेश दे कि अदालतों के फैसलों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए और कोई भी अनावश्यक टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए, जिससे अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचे। मामले के अनुसार याचिकाकर्त्ता को टांडा मैडीकल कॉलेज में फिजियोथैरेपिस्ट के पद पर नियुक्ति दी गई थी। उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने 21 दिसम्बर 2022 को मैडीकल कॉलेज टांडा जिला कांगड़ा के प्रिंसीपल को निर्देश दिया था कि वे याचिकाकर्त्ता की सेवाओं को रोगी कल्याण समिति से सरकारी अनुबंध में बदल दें। जब इन आदेशों की अनुपालना नहीं हुई तो प्रार्थी ने हाईकोर्ट में अनुपालना याचिका दायर की।

कोर्ट ने जब अनुपालना रिपोर्ट मांगी तो स्वास्थ्य सचिव ने हिदायत के माध्यम से कोर्ट के फैसले को अपने स्तर पर ही त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि 21.12.2022 को दिए गए फैसले में स्पष्ट रूप से यह त्रुटि है कि 28.03.2016 के नीतिगत फैसले के अनुसार, याचिकाकर्त्ता डॉ. शेखर शर्मा की सेवाओं को केवल आरकेएस/सोसायटी अनुबंध में बदला जाना था, न कि सरकारी अनुबंध में। इसलिए स्वास्थ्य विभाग ने इस फैसले के खिलाफ खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की है, क्योंकि 21.12.2022 के फैसले की भाषा ने मामले के निपटारे पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

इतना ही नहीं कोर्ट अथवा प्रार्थी पर ही अपील के अधिकार को दबाने का आरोप लगाते हुए कहा गया कि अपील का अधिकार एक मूल अधिकार है और इस अधिकार से वंचित करना एक गंभीर क्षति है; और क्योंकि प्रतिवादी विभाग को दिनांक 21.12.2022 के निर्णय के विरुद्ध अपील करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है और क्योंकि कानून गलत निर्णयों के विरुद्ध अपील का प्रावधान करता है, इसलिए प्रतिवादी विभाग ने उच्च न्यायालय में अपील के अधिकार का प्रयोग किया है। कोर्ट ने इसे न केवल अवमाननापूर्ण बल्कि अपमानजनक पाते हुए सरकार के सबसे बड़े अधिकारी को तलब किया है। मामले की सुनवाई 7 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

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