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गाजियाबाद, 24 मार्च। देश में पहली बार इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के तहत एक मरीज की मौत का मामला सामने आया है। 31 वर्षीय Harish Rana ने मंगलवार को दिल्ली के AIIMS Delhi में अंतिम सांस ली। वह पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे और जीवन पूरी तरह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर था।
इस पूरे मामले का एक भावनात्मक हिमाचल कनेक्शन भी सामने आया । हरीश राणा का परिवार मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर क्षेत्र के पालेटा गांव से जुड़ा हुआ है।
भले ही परिवार लंबे समय से गाजियाबाद में रह रहा था, लेकिन गांव से उनका रिश्ता हमेशा बना रहा। जैसे ही इच्छामृत्यु की खबर सामने आई, पालेटा गांव में शोक की लहर दौड़ गई। स्थानीय लोग इसे “अपने गांव के बेटे” की पीड़ा मानकर भावुक हो उठे।
ग्रामीणों के अनुसार, हरीश को कोरोना काल के दौरान गांव भी लाया गया था, जहां पूरा परिवार उसकी देखभाल करता था। गांव के लोगों ने परिवार के धैर्य और संघर्ष को करीब से देखा और अब इस अंत ने सभी को गहरे दुख में डाल दिया है।
बता दें कि Supreme Court of India ने 11 मार्च को हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। इसके बाद 14 मार्च को उन्हें एम्स में शिफ्ट किया गया और 16 मार्च को उनकी फीडिंग ट्यूब हटा दी गई। इसके बाद उन्हें पैसिव यूथेनेशिया के तहत प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी गई।
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि मरीज को जिंदा रखने के लिए दी जा रही चिकित्सा सहायता जैसे वेंटिलेटर, दवाइयां या फीडिंग ट्यूब को हटा दिया जाए, ताकि वह स्वाभाविक रूप से जीवन त्याग सके। भारत में यह कानूनी है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया (दवा देकर मौत देना) गैरकानूनी माना जाता है।
हरीश राणा का जीवन 2013 में एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गया था। वह चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे, जब हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके पूरे शरीर में लकवा हो गया और वह कोमा में चले गए। डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित बताया था, जिसमें मरीज पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है और रिकवरी की संभावना बेहद कम होती है।
13 साल तक लगातार बिस्तर पर रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे घाव (बेडसोर्स) बन गए थे और उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। परिवार ने इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन धीरे-धीरे उम्मीदें खत्म हो गईं। इस लंबे संघर्ष ने परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से भी तोड़ दिया।
भारत में 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी थी और इसे संविधान के आर्टिकल 21 के तहत ‘सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार’ का हिस्सा बताया था।
हरीश राणा का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह पहला केस है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सभी प्रक्रियाओं—मेडिकल बोर्ड की जांच, कानूनी अनुमति और निगरानी—को पूरी तरह लागू किया गया।
यह घटना जहां एक ओर चिकित्सा और कानून के जटिल पहलुओं को सामने लाती है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठाती है कि असहनीय पीड़ा में जी रहे मरीजों के लिए ‘सम्मानजनक मृत्यु’ का अधिकार कितना महत्वपूर्ण है।
