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हिमाचल: PET स्कैन के लिए देने होंगे 10 हजार, प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी

Anil Kashyap
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न्यूज अपडेट्स 
शिमला, 11 फरवरी। हिमाचल प्रदेश में लगातार महंगी होती स्वास्थ्य सेवाओं के बीच राज्य के सबसे बड़े अस्पताल इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भी इलाज महंगा हो गया है और रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) ने सेवा शुल्कों में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। स्वास्थ्य मंत्री डी आर शांडिल की अध्यक्षता में 9 फरवरी को आरकेएस की बैठक में लिए गए फैसलों में अस्पताल प्रशासन को पंजीकरण स्लिप सहित अतिरिक्त शुल्क और पीईटी स्कैन, एमआरआई, सीटी स्कैन और विशेष वार्ड जैसी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बदला हुआ शुल्क लगाने का निर्देश दिया गया था।

यह बढ़ोतरी आरकेएस के निर्देशों के बाद हुई है, क्योंकि गरीब मरीजों के लिए दी जाने वाली निधि को कथित तौर पर तब तक रोक दिया गया है जब तक कि राज्य विधानसभा में स्वास्थ्य निधि की मांग को अंतिम रूप नहीं दे दिया जाता, जिससे आम आदमी की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गयी हैं। अब विशेष वार्ड में रात भर रुकना आम मरीजों की पहुंच से तेजी से दूर होता जा रहा है। एक विशेष वार्ड का शुल्क 1,500 रुपए से बढ़ाकर 2,000 रुपए प्रति दिन कर दिया गया है, जबकि साझे विशेष वार्ड का रेट अब 750 रुपए से बढ़कर 1,000 रुपए प्रति दिन हो गया है। कई मरीज़ों और इंतज़ार करने वालों के लिए यह शुल्क अस्पताल में कम समय तक रहना भी पैसे के हिसाब से बोझिल बना देता है। कई तरह की जांच भी महंगी हो गयी हैं। 

आरकेएस ने बढ़ते खर्च और रखरखाव की ज़रूरतों का हवाला देते हुए एमआरआई और पीईटी स्कैन के लिए नए शुल्क मंज़ूर किये हैं। मरीज़ों को अब पीईटी स्कैन के लिए 10,000 रुपए देने होंगे, जबकि एमआरआई शुल्क अलग-अलग श्रेणी में 2,700 से 4,000 रुपए के बीच तय किये गये हैं। आरकेएस ने इसके साथ ही अपनी आय बढ़ाने के लिए आईजीएमसी कैंपस में काम करने वाले सभी दुकानदारों से सालाना कमाई का पांच प्रतिशत वसूलने का भी फैसला किया है। इसके अलावा 10 रुपये का स्लिप शुल्क भी लिया जाएगा।

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि ये उपाय सेवा और अवसंरचना को बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि पैसे का बोझ आखिरकार मरीज़ों पर ही डाला जा रहा है। इस बीच कल्याणकारी योजनाओं के तहत भुगतान में देरी को लेकर चिंता बनी हुई है। हिम केयर योजना के तहत लंबित बिल लगभग 400 करोड़ रुपये तक बढ़ गये हैं, जिससे अस्पताल और लाभार्थी दोनों पर दबाव बढ़ रहा है। स्वास्थ्य मंत्री ने भरोसा दिलाया कि हिम केयर और आयुष्मान भारत के तहत बकाया चुका दिया जाएगा, हालांकि इस देरी से सेवा पर असर पड़ रहा है। ज़्यादा उपभोक्ता शुल्क, महंगी जांच और बीमा भुगतान में देरी इस बात का संकेत है कि राज्य धीरे-धीरे बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से पीछे हट रहा है, जिससे राज्य के आम लोगों के लिए सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं एक बड़ी चुनौती बन गयी हैं।

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