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शिमला, 06 जनवरी। हिमाचल प्रदेश में जंगलों से जुड़े अपराधों पर अब कानून और सख्त हो गया है। लकड़ी की तस्करी और पेड़ों के अवैध कटान जैसे मामलों में पहले जहां कार्रवाई में देरी होती थी, वहीं अब पुलिस और वन विभाग तुरंत कदम उठा सकेंगे। प्रदेश हाईकोर्ट ने इस संबंध में बड़ा फैसला सुनाते हुए पुराने कानूनी भ्रम को दूर कर दिया है। हाईकोर्ट ने साफ किया है कि भारतीय वन अधिनियम के तहत लकड़ी की तस्करी, अवैध कटान और वन उपज के पारगमन से जुड़े मामले अब संज्ञेय अपराध माने जाएंगे। इसका मतलब यह है कि पुलिस या वन अधिकारी इन मामलों में आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये अपराध जमानती ही रहेंगे। यानी गिरफ्तारी के बाद आरोपी को कानून के तहत जमानत मिल सकती है। अब तक इन मामलों को असंज्ञेय माना जाता था, जिसके कारण पुलिस बिना अदालत की अनुमति के कार्रवाई नहीं कर पाती थी। इससे तस्करों को फायदा मिलता था और मौके पर सख्त कार्रवाई संभव नहीं हो पाती थी। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब अधिकारियों के हाथ बंधे नहीं रहेंगे।
अदालत ने कहा कि वन अधिनियम की धारा 65 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को बांड भरने पर रिहा किया जा सकता है। यानी कानून सख्त हुआ है, लेकिन कानूनी अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने वर्ष 2009 के स्टेट बनाम सतपाल सिंह मामले में दिए गए फैसले को सही नहीं माना। अदालत ने कहा कि उस फैसले में वन अधिनियम की धारा 64 पर ध्यान नहीं दिया गया था, जिसके कारण अपराधों को गलत तरीके से असंज्ञेय मान लिया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय वन अधिनियम की धारा 42 और हिमाचल प्रदेश वन उपज पारगमन नियमों के तहत आने वाले अपराध संज्ञेय हैं। इसी फैसले में हाईकोर्ट ने PIT NDPS एक्ट के तहत नशा तस्करों की निवारक हिरासत को लेकर भी राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि हिरासत के आदेश में भले ही कोई गलती नहीं है, लेकिन हिरासत के स्थान और शर्तों को लेकर साफ नियम होने चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह 15 जनवरी तक एक आधिकारिक आदेश जारी करे, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि हिरासत में लिए गए लोगों को कहां और किन शर्तों पर रखा जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि आदेश हिंदी भाषा में हो और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी लिखित रूप में दी जाए।
अदालत ने अवैध हिरासत को लेकर दायर याचिका और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग को खारिज कर दिया। यह याचिका पवन कुमार की ओर से दायर की गई थी, जिसके खिलाफ कांगड़ा में चरस और चिट्टा तस्करी के छह मामले दर्ज थे। उसे तीन महीने की निवारक हिरासत में रखा गया था, जिसे बाद में बढ़ाया गया था।
