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चंडीगढ़, 02 अगस्त। यूटी परिवहन विभाग और हिमाचल सड़क परिवहन निगम (एचआरटीसी) के बीच बसों के संचालन पर एक बार फिर तनातनी शुरू हो गई है। हिमाचल की नई वोल्वो बस बिना एनओसी और काउंटर के आईएसबीटी-43 पहुंच गई, जिसका विरोध शुरू हो गया। बस में खुद एचआरटीसी के अधिकारी बैठकर आए लेकिन बस को आईएसबीटी से बाहर कर दिया गया। परिवहन विभाग के अधिकारियों ने भी दोबारा बिना कागजों के आने पर जब्त करने की चेतावनी दे डाली।
हैरानी की बात है कि बस में खुद बैठकर एचआरटीसी के शिमला रीजन के डिवीजनल मैनेजर पहुंचे थे। बस 9:45 बजे आईएसबीटी-43 के अंदर आई। जब अधिकारियों ने देखा तो चंडीगढ़ परिवहन विभाग की एनओसी और स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी द्वारा जारी किए जाने वाले काउंटर टाइम के कागज मांगे। बस के पास कुछ भी नहीं था।
यह बस शिमला से आई थी और चंडीगढ़ से होकर चंबा के लिए निकली थी। जब कागज नहीं दिखा पाए तो तुरंत बस को बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद एचआरटीसी के अधिकारियों ने सीटीयू के अधिकारियों के साथ बैठक भी की जिसमें दो टूक जवाब दिया गया कि बिना कागजों के बस चलने नहीं दी जाएगी। बता दें सीटीयू ने पहले भी लिखित में आरोप लगाया है कि एचआरटीसी की 50 से ज्यादा बसें अवैध रूप से चंडीगढ़ में चलती है जिनके पास जरूरी मंजूरी नहीं हैं।
दिन में सीटीयू की बस जाती थी चंबा, दो साल से बंद
हिमाचल के कई रूट को लेकर सीटीयू और हिमाचल रोजवेड में विवाद चल रहा है। सबसे बड़ा विवाद चंबा रूट को लेकर है जो दो साल से बंद है। क्योंकि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में वहां की एक निजी बस कंपनी ने केस दायर कर बस को रोकने की मांग की थी। कोर्ट ने रोक लगाई है और मामले में दो साल से सुनवाई चल रही है।
चंडीगढ़ की बस को मंजूरी नहीं, खुद बिना कागज चला रहे
साढ़े 7 महीने पहले पंजाब के राज्यपाल व चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाबचंद कटारिया ने सीटीयू की 60 लॉन्ग रूट की बसों की हरी झंडी दिखाई थी। इसमें सीटीयू ने दावा किया था कि वो बैजनाथ, सरकाघाट और जोगिंदर नगर के लिए भी बस चलाएंगे लेकिन आजतक ये बसें नहीं चल पाई हैं। कारण है कि हिमाचल ने सीटीयू की इन बसों को काउंटर टाइम ही नहीं दिया। इधर हिमाचल ने बिना एनओसी और काउंटर टाइम के बस चला दी और चंडीगढ़ भी लेकर पहुंच गए। नियमों के अनुसार किसी भी अन्य राज्य व यूटी के लिए बस चलाने से करीब 3 से 6 महीने पहले परमिट, काउंटर टाइम आदि की मंजूरी के लिए प्रक्रिया शुरू की जाती है। कई महीने पत्राचार होता है और सभी मंजूरी मिलने के बाद ही बस चलाई जाती है लेकिन हिमाचल ने ऐसा कुछ नहीं किया।