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शिमला, 30 जुलाई। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग से संबंधित एक अहम मामले में राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों द्वारा बार-बार निर्देशों के बावजूद जवाब दाखिल न करने पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना गलती करने वाले जिम्मेदार अधिकारी से वसूलने के निर्देश दिए गए हैं और इसे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भुगतान करने का आदेश दिया गया है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि पिछली सुनवाई में ही अंतिम मौका दिया गया था, बावजूद इसके अब तक कोई उत्तर दाखिल नहीं किया गया। सरकार की ओर से इस बार भी दो सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा गया, जिस पर अदालत ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि जब तक जुर्माना जमा नहीं होता, तब तक कोई राहत नहीं दी जाएगी।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर अगली बार भी जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो सरकार और अन्य संबंधित पक्षों का जवाब देने का अधिकार समाप्त मान लिया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित की गई है।
यह निर्णय न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका अब ढिलाई को बर्दाश्त नहीं करने के मूड में है। यह केस हिमाचल में आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के हितों और न्यायिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है, जिस पर प्रदेश भर की निगाहें टिकी हुई हैं।