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शिमला, 01 सितंबर। प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2003 के बाद राज्य सरकार के विभागों में स्थायी रूप से शामिल (अब्जॉर्ब) किए गए निगमों/बोर्डों के कर्मचारी केंद्रीय नागरिक सेवा (पैंशन) नियम, 1972 के तहत पुरानी पैंशन योजना के हकदार नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने धनी राम (मृतक) बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में यह फैसला सुनाते हुए एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्त्ता की अपील खारिज कर दी गई थी।
मृतक कर्मचारी धनी राम को वर्ष 1979 में एच.पी. स्टेट हस्तशिल्प एवं हथकरघा निगम में चपड़ासी/चौकीदार के पद पर नियुक्त किया गया था। 23 मार्च 1985 को उनकी सेवाएं नियमित की गई थीं। 8 जनवरी 2003 को उन्हें सामाजिक, महिला एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग में प्रतिनियुक्ति पर क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया। राज्य सरकार की 11 मई 2012 की नीति के तहत, उन्हें 4 जून 2013 को विभाग में स्थायी रूप से समायोजित कर लिया गया। धनी राम 31 मार्च 2015 को कनिष्ठ सहायक के पद से सेवानिवृत्त हुए। शुरूआत में उन्हें पैंशन दी गई, लेकिन मई 2018 में विभाग ने यह महसूस करते हुए पैंशन रोक दी कि उन पर पुरानी पैंशन योजना लागू नहीं होती।
अदालत ने कहा कि 11 मई 2012 की समायोजन नीति के क्लॉज 7 और 8 के अनुसार पुरानी पैंशन योजना (सीसीएस 1972) का लाभ केवल उन्हीं कर्मचारियों को मिलेगा, जो 14 मई 2003 को या उससे पहले अपने मूल संगठन (पैरंट डिपार्मैंट) में नियमित रूप से नियुक्त हुए थे और वहां उन पर 1972 के नियम लागू होते थे। चूंकि धनी राम अपने मूल निगम (हिमाचल प्रदेश राज्य हैंडीक्राफ्ट कॉर्पोरेशन) में ई.पी.एफ./नई पैंशन योजना से आच्छादित थे, न कि सीसीएस पैंशन रूल 1972 से, इसलिए उन पर नई अंशदायी पैंशन योजना ही लागू होगी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि याचिकाकर्त्ता को पैंशन का गलत भुगतान किया गया था, लेकिन इसमें याचिकाकर्त्ता की तरफ से कोई गलत बयान या धोखाधड़ी नहीं की गई थी। इसलिए, 1 मई 2018 से पहले दिए जा चुके पैंशन के पैसों की वसूली कर्मचारी या उनके कानूनी वारिसों से नहीं की जाएगी। खंडपीठ ने अपीलकर्त्ता की ओर से पारस राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का हवाला देकर राहत की मांग की थी।
हालांकि पीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पारस राम का मामला अलग था, क्योंकि वहां स्वास्थ्य विभाग में नियुक्ति तिथि को मूल विभाग की नियमितीकरण तिथि (1998) माना गया था और समायोजन आदेश सेवानिवृत्ति के बाद जारी हुए थे। उच्च न्यायालय ने माना कि सरकार द्वारा 1 मई 2018 से पैंशन वापस लेने का निर्णय न्यायसंगत और नियमों के मुताबिक था। अदालत ने एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए याचिकाकर्त्ताओं (धनी राम के कानूनी प्रतिनिधियों) की अपील खारिज कर दी।
