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शिमला, 04 जनवरी। कटरा से शिमला जा रही हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम की वॉल्वो बस उस समय सिर्फ़ यात्रियों को मंज़िल तक नहीं ले जा रही थी, बल्कि एक बुजुर्ग रिटायर्ड फौजी के लिए उम्मीद की सवारी बन चुकी थी।
कभी-कभी किस्मत जीवन की डोर ऐसे हाथों में सौंप देती है, जिनसे कोई बड़ी उम्मीद नहीं की जाती। न कोई एंबुलेंस, न सायरन और न ही अस्पताल की चौखट बस सड़क पर दौड़ती एक साधारण-सी बस और उसमें बैठे कुछ संवेदनशील लोग, जो वक्त रहते इंसानियत की कमान संभाल लेते हैं। ऐसा ही एक मार्मिक और प्रेरणादायक दृश्य हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम (HRTC ) की बस में देखने को मिला, जब चालक और परिचालक की सूझबूझ, साहस और मानवता ने मौत से जूझ रहे एक बुजुर्ग फौजी को नई जिंदगी दे दी।
कटरा से शिमला जा रही एचआरटीसी बस (HP-63-8671) अपनी तय यात्रा पर थी। बस में रोजमर्रा की तरह यात्री सवार थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा कुछ ही देर में जीवन और मृत्यु की लड़ाई में बदल जाएगी। बस में सफर कर रहे हमीरपुर जनपद के नादौन के रहने वाले एक बुजुर्ग फौजी “अमरनाथ” की अचानक तबीयत बिगड़ गई। उनके चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा था और देखते ही देखते उनकी हालत गंभीर हो गई। हर एक मिनट की कीमत जान से जुड़ी थी।
हालात को भांपते ही सरकाघाट के रहने वाले बस के परिचालक अनिल कुमार ने समझदारी और संवेदनशीलता का परिचय दिया। उन्होंने बिना घबराए तुरंत बस के चालक दिनेश कुमार (सोलन) से स्थिति साझा की। दोनों ने एक पल की देरी किए बिना तय किया कि नियम, समय-सारणी और मंज़िल से पहले इंसान की जान सबसे ऊपर है। बस को तुरंत जम्मू से आगे विजयपुरा में नजदीकी अस्पताल की ओर मोड़ दिया गया।
चालक दिनेश कुमार ने पूरी सावधानी और तेजी के साथ बस को अस्पताल तक पहुंचाया, ताकि बुजुर्ग फौजी को जल्द से जल्द चिकित्सा सहायता मिल सके। डॉक्टरों ने बाद में बताया कि यदि कुछ देर और हो जाती, तो परिणाम बेहद गंभीर हो सकते थे। समय पर अस्पताल पहुंचने से बुजुर्ग फौजी की जान बच गई।
इस मानवीय प्रयास में बस में मौजूद लोगों ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने परिचालक अनिल कुमार का पूरा सहयोग किया, बुजुर्ग को संभाला और अस्पताल पहुंचाने में मदद की। उनकी तत्परता और सेवा भावना ने इस संघर्ष को और मजबूती दी। सबसे भावुक पहलू यह रहा कि बस में सवार यात्रियों ने भी अद्भुत मानवता का परिचय दिया। किसी ने बस के रूट बदलने या देरी होने पर कोई आपत्ति नहीं जताई। सभी यात्रियों की एक ही सोच थी अगर किसी की जान बच सकती है, तो कुछ देर की देरी कोई मायने नहीं रखती।
इलाज के बाद जब बुजुर्ग फौजी की हालत स्थिर हुई, तो बस सुबह करीब साढ़े तीन बजे नादौन पहुंची। इसके बाद उन्हें सुरक्षित उनके घर तक छोड़ा गया। यह घटना केवल एक जीवन बचाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस इंसानियत की मिसाल है, जो आज भी हमारे समाज में जीवित है। एचआरटीसी के चालक दिनेश कुमार और परिचालक अनिल कुमार ने यह साबित कर दिया कि वे केवल बस नहीं चलाते, बल्कि जरूरत पड़ने पर किसी की जिंदगी की दिशा भी मोड़ सकते हैं। उनकी सूझबूझ, साहस और संवेदनशीलता हमेशा याद रखी जाएगी।
इस दौरान बस में सफर कर रहे सेना के तीन जवान भी मानवता की मिसाल बने, उन्होंने भी बीमार फौजी की तीमारदारी की, परिचालक को हर संभव सहयोग दिया और एक जवान ने मोबाइल पर अस्पताल की लोकेशन खोज कर समय रहते मदद सुनिश्चित की।
गौरतलब है कि 28 दिसंबर 2025 को भी निगम की दिल्ली से शिमला आ रही इसी वॉल्वो बस में एक एनआरआई युवती की तबीयत बिगड़ गई थी। ब्लड प्रेशर में गिरावट हो गई थी। बस पायलट दिनेश कुमार और परिचालक अनिल कुमार की इसी जोड़ी ने तुरंत प्राथमिक उपचार दिलवाया और 108 एंबुलेंस की व्यवस्था कर मानवीय संवेदनशीलता की मिसाल पेश की थी। ये बस दोपहर 12:40 पर चंडीगढ़ से शिमला के लिए रवाना हुई थी। कंडाघाट के नजदीक युवती की तबीयत ख़राब हो गई थी।
