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हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार को लगाई फटकार, कहा - सरकार चला रहे हो या पंचायत, यहां जानें

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न्यूज अपडेट्स 
शिमला, 13 नवंबर। हाईकोर्ट ने डाॅ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल टांडा में आऊटसोर्स आधार पर नर्सों की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया व जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने मैसर्ज आरके कम्पनी द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के पश्चात कहा कि जिन 60 नर्सों के नाम निजी ठेकेदार कम्पनी द्वारा नियुक्ति हेतु अनुमोदित किए गए हैं, उन्हें कार्य पर अगले आदेश तक न रखा जाए। 

कोर्ट ने 31 अक्तूबर को 80 नर्सों की आऊटसोर्स माध्यम से भरने को लेकर जारी विज्ञापन पर भी रोक लगाने के आदेश दिए। कोर्ट ने पाया कि विज्ञापन का अवलोकन करने पर यह तक पता नहीं चलता कि यह विज्ञापन किस कंपनी ने जारी किया है।

काेर्ट ने कहा- सरकार प्रदेश चला रही है या पंचायत

कोर्ट ने सरकार द्वारा स्थायी पदों के खिलाफ अस्थायी भर्तियां करने पर कहा कि सरकार के ऐसे कृत्यों से यह पता ही नहीं चल रहा है कि वह प्रदेश को चला रही है या किसी पंचायत को। सरकार का कोई अधिकारी न्यायालयों में शपथपत्र दायर कर कहता है कि वह अब अस्थायी भर्तियां नहीं करेंगे और दूसरी ओर कोई अधिकारी अस्थायी भर्तियां करने की अनुमति दे देता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकार में एक हाथ को यह पता ही नहीं चल पा रहा कि दूसरा हाथ क्या कर रहा है। हर जगह नियुक्तियों को लेकर सब कुछ गड़बड़ा गया है।

जिन फर्मों के मालिक ही अशिक्षित, उन्हें भर्तियों का काम सौंपना आश्चर्यजनक

कोर्ट ने पिछली सुनवाई को हिमाचल प्रदेश राज्य इलैक्ट्रॉनिक्स विकास निगम लिमिटेड द्वारा दायर जवाब को देखने के बाद कहा था कि इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि नर्सों की भर्ती को लेकर शुरू की गई प्रक्रिया के संबंध में प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से कैसे अंजाम दिया गया। कोर्ट ने आवश्यक विवरण के साथ यह बताने को कहा था कि कितने ठेकेदारों ने उक्त कार्य हेतु निविदा के लिए बोलियां दीं। उनके प्रस्तावों का मूल्यांकन कैसे और किस स्तर पर किया गया और उसके बाद सफल बोलीदाता को उक्त अनुबंध प्रदान करने के लिए क्या विचार किए गए।  

गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में पाया था कि आऊटसोर्स भर्ती करने वाले ऐसे 36 ठेकेदारों के नाम हैं, जिन्हें हिमाचल प्रदेश राज्य इलैक्ट्रॉनिक्स विकास निगम द्वारा अनुमोदित किया गया है। कोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया सूची को देखने से पता चलता है कि उनमें से कई का भर्तियों से कोई लेना-देना नहीं है और उन्होंने कभी भी भर्ती का कोई मामला नहीं संभाला है। अकेले छोड़ें ऐसे मामले भी हो सकते हैं, जहां इन फर्मों के मालिक खुद पूरी तरह से अशिक्षित या अर्ध-साक्षर हों, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उन्हें कानून अधिकारी, नर्स, डॉक्टर आदि जैसे जिम्मेदार पदों पर आऊटसोर्स आधार पर भर्ती करने का काम सौंपा गया हो।

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