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राजभवन और सरकार आमने सामने, कुलपति नियुक्ति पर छिड़ा विवाद, राज्यपाल ने उठाए सवाल, यहां जानें

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शिमला, 17 अगस्त। हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ समय से राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच तनाव गहराता जा रहा है। विवाद की जड़ विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियों और लंबे समय से राजभवन में अटके विधेयक बने हुए हैं। सरकार और राज्यपाल दोनों के बयान अब खुलकर मीडिया में आ चुके हैं, जिससे यह टकराव और तीखा हो गया है।

राजभवन और सरकार आमने-सामने

प्रदेश सरकार का आरोप है कि 2023 से अब तक 15 महत्वपूर्ण विधेयक राजभवन में लंबित हैं। इनमें सुखाश्रय बिल, भ्रष्टाचार रोकथाम से जुड़े एक्ट, और पार्टी बदलने पर रोक लगाने वाले विधेयक भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री सुक्खू का कहना है कि राज्यपाल को संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करते हुए सरकार की सलाह पर कार्य करना चाहिए।

कुलपति नियुक्ति पर छिड़ा विवाद

बीते दिनों सरकार ने कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और बागवानी विश्वविद्यालय नौणी में कुलपति नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन रद्द कर दिए थे। लेकिन राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने कुलाधिपति के अधिकारों का हवाला देकर इन्हें फिर से बहाल कर दिया और अंतिम तिथि बढ़ा दी। इस पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने फिलहाल राज्यपाल के आदेश पर स्टे लगा दिया है।

राज्यपाल ने उठाए सवाल

शिमला में मीडिया से बातचीत करते हुए राज्यपाल ने कहा कि वे कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं, लेकिन उन्होंने जो कदम उठाए, वे विश्वविद्यालयों के हित में थे। उन्होंने जनता से सवाल किया कि आखिर नौणी और पालमपुर विश्वविद्यालयों के साथ ऐसा क्यों किया गया।

सीएम ने जताई आपत्ति

सीएम सुक्खू ने स्पष्ट किया कि कुलपति नियुक्तियों में चांसलर का अधिकार संविधान प्रदत्त नहीं है, बल्कि राज्य सरकार द्वारा तय किया गया है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने राज्यपाल को तथ्य गलत ढंग से पेश किए हैं। मुख्यमंत्री का मानना है कि विश्वविद्यालयों सहित हर मुद्दे पर सरकार की राय को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

लंबित विधेयकों की लिस्ट

साल 2023 से अब तक कुल 15 विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। इनमें लोकतंत्र प्रहरी सम्मान रिपील बिल, सुखाश्रय बिल, कृषि एवं बागवानी विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, पुलिस संशोधन बिल, संगठित अपराध रोकथाम बिल और ड्रग्स नियंत्रण से जुड़े विधेयक प्रमुख हैं। इस विवाद ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमाचल की राजनीति में संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर संस्थाओं का टकराव बढ़ रहा है, और इसका असर शिक्षा और विकास के मुद्दों पर किस तरह पड़ेगा।

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